एफटीए से हिमाचल की बागवानी पर संकट, विदेशी सेब से टूट सकती है स्थानीय बाजार की कमर
अभी भी बागवान नहीं जागे तो करना होगा पलायन
शिमला : भारत और यूरोपीय यूनियन (ई.यू.) के बीच प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (एफटीए) हिमाचल प्रदेश की बागवानी अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनता नजर आ रहा है। इस समझौते के लागू होने पर यूरोपीय देशों से सस्ते सेब और अन्य फल बड़ी मात्रा में भारतीय बाजार में पहुंच सकते हैं, जिससे प्रदेश के लाखों बागवानों की आय पर सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
हिमाचल प्रदेश देश का प्रमुख सेब उत्पादक राज्य है। यहां सेब के साथ-साथ नाशपाती, चेरी, आड़ू और प्लम की खेती पर बड़ी आबादी की आजीविका निर्भर है। प्रदेश की बागवानी से जुड़ा कारोबार करीब पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक का है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात शुल्क में कटौती होने पर विदेशी फल सस्ते दामों में उपलब्ध होंगे, जिससे स्थानीय उत्पादकों को उचित मूल्य मिलना मुश्किल हो जाएगा।
वर्तमान में यूरोपीय यूनियन से आयात होने वाले किवी और नाशपाती पर लगभग 33 प्रतिशत शुल्क लगता है, जो प्रस्तावित एफटीए में घटकर करीब 10 प्रतिशत रह सकता है। वहीं सेब पर लगने वाला शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत होने की संभावना है। यह व्यवस्था कोटा आधारित होगी, लेकिन तय सीमा के भीतर सस्ता आयात बाजार की कीमतों को प्रभावित करेगा। इटली, बेल्जियम और पोलैंड जैसे यूरोपीय देश बड़े पैमाने पर सेब उत्पादन करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
विदेशी सेब की आवक से बढ़ेगा दबाव
न्यूजीलैंड से आयात होने वाला सेब भी 20 प्रतिशत शुल्क पर कोटा प्रणाली के तहत आएगा, जिसकी सीमा करीब 32,500 मीट्रिक टन तय की गई है। नवंबर में ईरान, अप्रैल में न्यूजीलैंड और दिसंबर से फरवरी के बीच दक्षिण अफ्रीका से सेब बाजार में पहुंचने की संभावना रहती है। ऐसे में पूरे वर्ष विदेशी सेब की उपलब्धता बनी रहेगी, जो स्थानीय बागवानों के लिए चिंता का विषय है।
आढ़तियों की चलेगी मनमानी
एफटीए लागू होने पर बाजार में विदेशी फलों की भरमार से आढ़तियों का दबदबा बढ़ सकता है। कीमत तय करने में उनकी भूमिका मजबूत होगी और बागवानों को मजबूरी में कम दाम पर अपनी फसल बेचनी पड़ सकती है। कम कीमत मिलने की स्थिति में सेब को कोल्ड स्टोर में रखना भी घाटे का सौदा साबित हो सकता है।
राजनीतिक स्तर पर साझा पहल की मांग
सेब उत्पादक संगठन से जुड़े दीपक सिंघा ने कहा कि फिलहाल यह ड्राफ्ट समझौता है और अंतिम हस्ताक्षर होना शेष है। यदि इसमें सेब, किवी और नाशपाती जैसे उत्पादों को बाहर नहीं किया गया तो हिमाचल की बागवानी आर्थिकी और हजारों परिवारों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने मांग की कि कांग्रेस नेतृत्व और पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर संयुक्त रूप से केंद्रीय वाणिज्य मंत्री से मुलाकात कर इस विषय पर ठोस रणनीति बनाएं।
संयुक्त किसान मंच के संयोजक हरीश चौहान और प्रोग्रेसिव सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष लोकेंद्र बिष्ट ने भी केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि एफटीए लागू करते समय सेब जैसे संवेदनशील उत्पादों पर आयात शुल्क में भारी कटौती न की जाए।








