शिमला: हिमाचल प्रदेश में लंबे समय से पंचायतीराज संस्थाओं के चुनावों को लेकर राज्य के सभी 12 जिलों में आरक्षण रोस्टर जारी होने के बाद चुनावी प्रक्रिया को लेकर तस्वीर साफ हो गई है। पिछले कुछ महीनों से चुनाव में देरी को लेकर सवाल उठ रहे थे, लेकिन अब कोर्ट के निर्देशों के बाद प्रक्रिया तेज हो गई है। माना जा रहा है कि 31 मई से पहले चुनाव संपन्न करवा लिए जाएंगे। इस पूरे घटनाक्रम में जिस शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, वह है “आरक्षण रोस्टर”। आम लोगों के लिए यह शब्द थोड़ा जटिल लग सकता है, लेकिन असल में यही तय करता है कि किस सीट पर कौन चुनाव लड़ सकता है।
आरक्षण रोस्टर एक तरह की सूची या चार्ट होता है, जिसमें यह तय किया जाता है कि किस पंचायत, वार्ड या पद को किस वर्ग के लिए आरक्षित किया जाएगा। इसमें अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और महिलाओं के लिए सीटें तय की जाती हैं। यह पूरी प्रक्रिया संबंधित क्षेत्र की आबादी के अनुपात पर आधारित होती है. यानी जिस वर्ग की आबादी जितनी अधिक होगी, उसे उतना ही प्रतिनिधित्व दिया जाएगा। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि समाज के हर वर्ग को शासन में भागीदारी का मौका मिले।
1995 से शुरू हुआ रोस्टर सिस्टम
भारत में 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायत स्तर पर लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में बड़ा बदलाव आया। इसी के तहत हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1994 में नया पंचायतीराज अधिनियम लागू किया गया। इसके बाद 1995 में हुए पंचायत चुनावों में पहली बार आरक्षण रोस्टर लागू किया गया। इस कदम से महिलाओं, अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग को स्थानीय स्तर पर राजनीतिक भागीदारी का अवसर मिला. इससे ग्रामीण लोकतंत्र को नई दिशा मिली और सत्ता का विकेंद्रीकरण हुआ।
समय के साथ इस प्रणाली में कई बदलाव किए गए। वर्ष 2008 में पंचायतीराज एक्ट में संशोधन कर महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाया गया. इसके बाद 2010 के चुनावों में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया गया। इससे पहले महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिलता था। नए बदलाव के बाद गांव की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी. आज कई पंचायतों में महिलाएं प्रमुख पदों पर नेतृत्व कर रही हैं और फैसले ले रही हैं।
हिमाचल प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए वर्ष 2000 में आरक्षण लागू किया गया। यह अधिकतम 15 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है. इससे पहले पंचायत चुनावों में इस वर्ग को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाता था। अब SC, ST, OBC और महिलाओं के लिए अलग-अलग आरक्षण तय होने से समाज के हर वर्ग को बराबरी का मौका मिलने लगा है।
ऐसे तय होता है आरक्षण रोस्टर
आरक्षण रोस्टर पूरी तरह एक तय प्रक्रिया के अनुसार लागू किया जाता है. इसमें अलग-अलग स्तरों पर अलग आधार लिया जाता है। ग्राम पंचायत वार्ड सदस्य।पंचायत की कुल आबादी के आधार पर। पंचायत प्रधान: ब्लॉक स्तर की आबादी के आधार पर
पंचायत समिति सदस्य: ब्लॉक स्तर पर
जिला परिषद सदस्य: जिला स्तर की आबादी के आधार पर, जिला परिषद अध्यक्ष: पूरे राज्य की आबादी के अनुपात के अनुसार आरक्षण का क्रम भी तय होता है। पहले SC, फिर ST, उसके बाद OBC और अंत में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं।
जनजातीय क्षेत्रों में अलग नियम
हिमाचल के जनजातीय क्षेत्रों में आरक्षण को लेकर अलग नियम लागू होते हैं।पंचायत एक्सटेंशन टू शेड्यूल एरिया एक्ट (PESA) 1996 के तहत इन क्षेत्रों में जिला परिषद अध्यक्ष का पद केवल अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित रहता है। इसका उद्देश्य इन क्षेत्रों के लोगों को अधिक प्रतिनिधित्व देना और उनकी परंपराओं और अधिकारों की रक्षा करना है।
गर्माया चुनावी माहौल
आरक्षण रोस्टर जारी होते ही प्रदेश में चुनावी माहौल भी गर्म होने लगा है. अब यह साफ हो गया है कि किस सीट पर कौन-सा वर्ग चुनाव लड़ सकता है. इसके बाद संभावित उम्मीदवारों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। गांवों में चौपाल से लेकर सोशल मीडिया तक चुनाव की चर्चा शुरू हो गई है. कई उम्मीदवार सोशल मीडिया के जरिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं और लोगों से समर्थन जुटाने में लगे हैं।






